About the Book
आचार्य यास्क प्रणीत निरुक्त शब्द व्युत्पत्ति, शब्द वर्गीकरण व शब्दार्थ विज्ञान पर एक तकनीकी प्रबंध है। इसीलिए ऋग्वेदभाष्य भूमिका में सायण ने कहा है– “अर्थावबोधे निरपेक्षतया पदजातं यत्रोक्तं तन्निरुक्तम्” अर्थात् अर्थ ज्ञान की दृष्टि से स्वतंत्ररूप से जहाँ पदों का संग्रह किया जाता है, वही निरुक्त है। इसी कारण निरुक्त को वेद के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाता है। निरुक्त के तीन कांडों में से दैवत कांड के ८-१२ अध्यायों में निहित देवगणों के प्राकृतिक निर्वचनलब्ध स्वरूप को आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक दृष्टि से इस पुस्तक में ग्रहण किया गया है। यहाँ यास्क की तर्कपूर्ण शैली से देवस्वरूप का निरूपण करते हुए अध्येताओं के बोधार्थ मंत्रार्थ के साथ भाष्यार्थ किया गया है।
About the Author
डॉ० इन्दु सोनी
माता-पिता: श्रीमती कमला देवी एवं श्री पटेल सोनी।
निवासी: भट्टु कलां, जिला फतेहाबाद, हरियाणा।
शिक्षा: बी.ए. (प्रथम श्रेणी, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, 2006), एम.ए. (प्रथम श्रेणी, संस्कृत विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, 2008), यू.जी.सी. (जे.आर.एफ, एस.आर.एफ, नेट, 2009), एम.फिल. (प्रथम श्रेणी, संस्कृत विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, 2010), पी.एच.डी. (संस्कृत विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, 2016)।
अध्यापन अनुभव: सरकारी महाविद्यालय-भट्टु कलां (हरियाणा), संस्कृत विभाग-दिल्ली विश्वविद्यालय (दिल्ली), कालिन्दी महाविद्यालय (दिल्ली), दौलतराम महाविद्यालय (दिल्ली), जाकिरहुसैन महाविद्यालय, सांध्य (दिल्ली), वर्तमान में जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली के संस्कृत विभाग में अध्यापन कार्य में संलग्न।
प्रकाशन: सामाजिक संस्थाएँ एवं राजशास्त्र (2016), विविध राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय शोध-पत्रिकाओं में शोध-पत्र प्रकाशित।


श्रीमद्भागवतमहापुराणम (9 खण्डों में ) - Srimad Bhagwat Mahapuran (Set of 9 Vols)
New Dimension in The Atharvaveda
Verbal Forms in the Rgveda 









Reviews
There are no reviews yet.