पुस्तक परिचय
श्रीमद्भागवतमहापुराण को समस्त पुराणों का सार माना गया है। महर्षि वेदव्यास ने आत्मतत्त्व-ज्ञान के समुचित समावेश हेतु इसकी रचना की। श्रीधरस्वामी की भावार्थदीपिका (श्रीधरी) टीका की विशेषता यह है कि इसमें प्रत्येक पद का निरूपण दर्शन-सिद्धान्तों के अनुरूप किया गया है, जिससे श्रीमद्भागवत की महत्ता और भी बढ़ जाती है। प्रस्तुत संस्करण में मूल श्लोकों के साथ श्रीधरी की मूल संस्कृत टीका तथा उसी के आधार पर तैयार की गई सरल हिंदी व्याख्या (भावप्रकाशिका) प्रथम बार ‘ब्रजजीवन प्राच्यभारती ग्रन्थमाला’ के अन्तर्गत प्रकाशित की गई है, जिससे श्रीधरी टीका का मूल भाव यथावत सुरक्षित रहते हुए सुगम बन जाता है। इसमें विस्तृत भूमिका, अन्वय एवं अकारादिश्लोकानुक्रमणिका भी सम्मिलित हैं। सम्पादन एवं हिंदी व्याख्या आचार्य शिवप्रसाद द्विवेदी द्वारा की गई है। यह ग्रन्थ 9 खण्डों में उपलब्ध है; प्रस्तुत प्रथम भाग में प्रथम एवं द्वितीय स्कन्ध सम्मिलित हैं।




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