पुस्तक परिचय
वैदिक वाङ्ग्मय की विस्तृत रूपरेखा : Vedic Vangmay Ki Vistrit Ruprekha
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| AUTHOR | Sumanlata Rastogi |
|---|---|
| Edition | 2010 |
| LANGUAGE | English |
| Pages | 348 |
| BINDING | Hardbound |
| ISBN | 81-7702-230-8 |
| PUBLISHER | Pratibha Prakashan |
Categories: Sanskrit, Vedas
Tags: Hindi, Indian Philosophy, Veda, vedas, Vedic Studies
वैदिक वाङ्मय विश्व की अमूल्य साहित्यिक निधि है। ये रचनात्मक तथा काव्यीय युग की देन है। इस नश्वर संसार में प्राणि मात्र का प्रमुख उद्देश्य दुःखों की समाप्ति कर सुखों को प्राप्त करना है, फिर भी अधिकतर यह देखा जाता है कि सुख के सम्पूर्ण संसाधनों को एकत्र कर लेने पर भी मानव दुःखी रहता है। इसका क्या कारण है? इस पर गम्भीरता से विचार करने पर यही ज्ञात होता है कि इसका प्रमुख कारण अज्ञान तथा अनाचार है।
वस्तुतः अज्ञान तथा अनाचार का नाश ज्ञान के द्वारा ही हो सकता है। ज्ञान प्रमुखतः दो प्रकार का होता है एक सांसारिक अर्थात् प्रकृति सम्बन्धित ज्ञान और दूसरा आध्यात्मिक ज्ञान- जिसे आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान आदि शब्दों द्वारा अभिहित किया जाता है। वर्तमान युग में भौतिकज्ञान अपने चरम पर पहुँच चुका है जिसकी सहायता से मानव चन्द्रलोक की यात्रा कर सकता है तो क्षणमात्र में अणुबमों के द्वारा सम्पूर्ण सृष्टि का विनाश भी कर सकता है।
आज विश्व में जो अशान्ति तथा तनाव का वातावरण व्याप्त है, जिसके कारण प्रत्येक व्यक्ति सन्तप्त एवं दुःखी दिखाई देता है। इससे मुक्ति पाने का यदि कोई सच्चा उपाय है तो वह है वेदों में वर्णित ज्ञान एवं उसकी शिक्षाऐं। क्योंकि मनुष्य अल्पज्ञ है, उसका ज्ञान अपरिपूर्ण तथा परिवर्तनशील होने के कारण अनित्य है। ऐसे सन्दिग्ध एवं अपूर्णज्ञान से कभी भी सत्कर्मों की सिद्धि नहीं हो सकती।
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