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उज्जयिनी की सांस्कृतिक परम्परा : Ujjayini Ki Sanskritik Parampara
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| Author-Editor/लेखक-संपादक | Ramkumar Ahirwar |
| Language/भाषा |
Hindi
|
| Edition/संस्करण | 2005 |
| Publisher/प्रकाशक | Pratibha Prakashan |
| Pages/पृष्ठ |
271
|
| Binding Style/बंधन शैली | Hard Cover |
| ISBN |
8177021095
|
Categories: Culture, History
Tags: culture, Hindi, Indian History, Indian Philosophy
प्राक्कथन
उत्थान-पतन, उत्कर्ष-अपकर्ष एक दूसरे के आनुपूर्वी और परस्पर अन्योन्याश्रित हैं। ऐतिहासिक सन्दर्भ इसके ज्वलन्त प्रमाण तथा राजवंशों एवं नगरों के इतिहास इसके प्रामाणिक उदाहरण कहे जा सकते हैं। यदि इस दृष्टि से स्थान एवं नगरों के सन्दर्भ में विचार किया जाये तो प्रायः स्पष्ट है कि समय और समाज के अनुसार उनके नाम और स्वरूप में परिवर्तन होता रहा है, अभी लगभग एक दशक के अन्तर्गत ही कलकत्ता का कोलिकाता, बम्बई का मुम्बई आदि, आदि को इस प्रसंग में उद्धृत किया जा सकता है। नाम-परिवर्तन की दृष्टि से तो उज्जयिनी का और समृद्ध इतिहास है। पौराणिक सन्दर्भ से तो उज्जयिनी क्रमशः स्वर्णशृङ्गा, कुशस्थली, अवन्तिका, अमरावती, चूड़ामणिपुरी, पद्मावती का ही परिवर्तित नाम है। कथासरित्सागर में तो सत्युग, द्वापर, त्रेता तथा कलियुग में क्रमशः इसके पद्मावती, भोगवती, हिरण्यवती एवं उज्जयिनी नामाभिधान होने के उल्लेख प्राप्त होते हैं; यद्यपि ऐतिहासिक सन्दर्भ में विशाला, प्रतिकल्पा एवं उज्जयिनी का ही प्राचुर्य है और कदाचित यही उज्जयिनी अपने अपभ्रंश रूप आधुनिक उज्जैन नाम से प्रतिष्ठित हो रहा है। काशी अथवा वाराणसी को छोड़ दिया जाए तो और अन्य कोई नगर नहीं परिलक्षित होता, जिसकी तुलना उज्जैन से की जा सके। इसका जितना समृद्ध वर्तमान है; उससे कहीं अधिक समृद्ध अतीत। अपने नाम और रूप-परिवर्तन के कारण जहाँ कालान्तर में ऐतिहासिक युग में यह प्रतिकल्पा नाम से अभिहित की गई; वहीं अपनी बहुविध समृद्धि के लिए ‘विशाला’ नाम से सम्बोधित हुई। चतुर्भाणी, कादम्बरी एवं काव्यमीमांसा में इसे क्रमशः ‘सार्वभौमनगर’, ‘सकलत्रिभुवनललामभूता’ और ‘महानगर’ विशेषण दिया गया है।
यदा-कदा अस्तित्वप्राप्त क्षणशीलता एवं अगति को भी अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान कर गति और प्रगति में परिवर्तित कर समृद्धि के प्रकर्ष पर पहुँचा देने में प्रायः समस्त ऐतिहासिक घटकों-राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, शिक्षा-कला का अपना महत्त्वपूर्ण स्थान दृष्टिगोचर होता है। १ नवम्बर १९५६ को स्वतन्त्र राज्य के रूप में अस्तित्व-प्राप्त मध्यप्रदेश के मालवाञ्चल के महत्त्वपूर्ण सभाग के रूप में गठित आधुनिक उज्जैन यद्यपि आज धार्मिक दृष्टि से ही अधिक वैशिष्ट्य रखता है। ‘महाकाल’ और ‘सिंहस्थ’ के कारण इसकी अपनी अन्तर्राष्ट्रीय पहचान है और इसके इस धार्मिक महत्त्व की बात औरंगज़ेब के समकालीन इटैलियन यात्री निकोलस के इस अभिकथन से भी पुष्ट होती है कि हिन्दू राजाओं के दरबार का स्थान उज्जैन शहर अधिक प्राचीन है। यद्यपि इस समय यह मात्र एक तीर्थ स्थान है, और लगभग विनष्ट हो चुका है। लगता है कि मुस्लिम शासकों, विशेषकर उनकी दक्षिण भारतीय नीति, ने उज्जैन को अधिक क्षति पहुँचाई, तो भी राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिति के क्षरण के बावजूद उसका अपना धार्मिक महत्त्व न केवल बना रहा, वरन् प्रवर्धमान रहा और इस नगर की मूल पहचान के रूप में उभरकर सामने आया। इसके इस धार्मिक महत्त्व की अपनी प्राचीन परम्परा है, प्रद्योतकाल में इसमें ब्राह्मण धर्म के साथ न केवल बौद्धधर्म को अस्तित्व मिला, वरन् वह इस क्षेत्र का सर्वप्रधान धर्म बन गया। यद्यपि अशोकोत्तर काल में इस क्षेत्र में शैव धर्म का प्रचलन रहा। महाकाल प्रकार की मुद्राओं को इसके प्रमाण के रूप में उद्धृत किया जा सकता है। महर्षि सान्दीपनि-कृष्ण प्रसंग से इस क्षेत्र में वैष्णव धर्म की प्राचीनता भी स्वयं सिद्ध है। तृतीय-चौथी सदी से इस क्षेत्र में शैव-वैष्णव धर्म के परस्पर समन्वय की बात भी विदित होती है। इस क्षेत्र से उपलब्ध शङ्करनारायणाभ्यां अभिलिखित मुद्राङ्क इसके ज्वलन्त प्रमाण हैं। गुप्तोत्तरकाल में शैव, बौद्ध सभी धर्मों में तन्त्र-मन्त्र का वर्चस्व बढ़ता है। शैव धर्म में कौल-कापालिक सम्प्रदाय का प्रभुत्व स्थापित होता है। शैव तान्त्रिकों में ‘कालानल’ का महत्त्व लक्षित होता है। ध्यातव्य है कि उदयादित्य की उदयपुर प्रशस्ति का ‘कालानल’ ही धार की भोज प्रशस्ति का ‘महायाल’ है। अतः कहीं स्वयं यह महाकाल मन्दिर अथवा द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग भी अपनी तान्त्रिक पहचान तो नहीं रखता? जैसे भाव सहज अनुमान्य हैं और इसके दक्षिणामुखी होने से इस प्रकार के अनुमान को और अधिक बल मिलता है।
पौराणिक सन्दर्भों में विविध प्रकार के लिङ्गों-पञ्चलिङ्ग, अष्टलिङ्ग और द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग, की गणना मिलती है। प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि काशी के विश्वेश जहाँ मात्र ज्योतिर्लिङ्ग में परिगणित हैं वहीं महाकाल की पञ्च अष्ट एवं द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग तीनों प्रसंगों में गणना मिलती है। मुस्लिम आक्रमण के परिणामस्वरूप क्षरणशील बौद्ध एवं शैवधर्म के स्थान पर वैष्णव धर्म का महत्त्व बढ़ता है। यद्यपि वह भी तन्त्र से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। इस समय अनेक वैष्णव तन्त्रागमों की रचना होती है। पाशुपतों से जहाँ नाथ सम्प्रदाय का विकास होता है, वहीं मत्स्येन्द्रनाथ योगिनी कौलमत के प्रवर्तक के रूप में लक्षित होते हैं। भर्तृहरि गुफा तो आज भी नाथपंथियों के अधिकार में है। चौरासी महासिद्धों में परिगणित सुविख्यात तान्त्रिक उज्जैन का ही निवासी था। पुराणों में २४ मातृकाओं की भी पूजा का वर्णन मिलता है। चौंसठयोगिनी का मन्दिर यहाँ आज भी विद्यमान है। ‘शक्तिसङ्गम तन्त्र’ की कालिका आज की गढ़कालिका हो सकती है। सल्तनत और मुगलकाल में यहाँ इस्लाम का भी प्रचलन होता है। किञ्चित अनन्तर बोहरा सम्प्रदाय की आस्था में भी अनेक मस्जिदों का निर्माण होता है। बर्तानी शासन के तहत १८६६ में केनेडियन प्रोटेस्टेण्ट मिशनरियों द्वारा उज्जैन में मसीही धर्म का प्रवेश हुआ और श्रीमती मुरे के माध्यम से १८८६ में मसीही धर्म के प्रचार को गति मिली, यद्यपि एक दशक के अनन्तर, १८९५ तक की अवधि में ईसाई धर्म स्वीकार करने वालों की संख्या मात्र दो दर्जन तक ही पहुँच सकी। कु. ग्रियर, कु. गुड फेलो ने इस धर्म के प्रचार को गति दी और १९३५ तक उनकी संख्या लगभग ८०० पहुँच गई। इस प्रकार उज्जैन भारतीय सांस्कृतिक परम्परा के अनुरूप सर्वधर्म की नगरी हो गई। सर्वधर्म समभाव के वातावरण को यहाँ गतिमिली, किन्तु इसे ‘श्रीविशाला विशालाम्’, ‘सार्वभौमनगर’, ‘सकलत्रिभुवनललामभूता’ ‘महानगर’ जैसे प्रदत्त विशेषणों की सार्थकता इसके धार्मिक नगरी से अधिक राजनीतिक वाणिज्य-व्यवसाय तथा विद्या-विज्ञान के केन्द्र होने के कारण ही अधिक थी।
राजनीतिक दृष्टि से विचार किया जाए तो ऐतिहासिक काल के पूर्व के ‘वृहद्रथ’ ‘वीतिहोत्र’ राजवंशीय शासकों के प्रसंगों को छोड़ देने पर भी प्रद्योत काल में उज्जयिनी भारत के चार राजतन्त्रों में विशिष्ट राजतन्त्र अवन्ति की राजधानी होने के गौरव से गौरवान्वित थी। यहाँ तक कि तत्कालीन राजतन्त्रों में प्रतिष्ठा-प्राप्त वत्सदेश के शासक उदयन भी परास्त हो यहाँ बन्दी रहे। इनके अनन्तर नन्दों का यहाँ शासन हुआ। मौर्य शासन, विशेषकर अशोक के युवराजत्व एवं सम्राटत्व दोनों कालों में इस क्षेत्र की बहुविध अभ्युन्नति हुई। तदनन्तर शुङ्गों-कणों ने भी इस क्षेत्र पर आंशिक ही सही प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष शासन बनाये रखा, किन्तु इनकी अशक्तता का लाभ उठाकर शीघ्र ही यह क्षेत्र स्वतन्त्र हो गया। गर्दभिल्ल वंश और उसके यशस्वी वंशज विक्रमादित्य के काल में यहाँ प्रशासनिक, आर्थिक सभी क्षेत्रों में अनेक प्रीतिकर प्रतिमान स्थापित हुए। यहीं से इस काल में भारत देश को ‘विक्रम संवत्’ मिला। सातवाहन तथा पश्चिमी शक-क्षत्रपों के शासन काल में भी इस क्षेत्र की गौरव-गरिमा में वृद्धि हुई। शक-क्षत्रपों के काल में तो इसे उनकी राजधानी होने का भी गौरव प्राप्त रहा। तदनन्तर गुप्तों और उनके द्वारा नियुक्त उपरिकों, जिन्हें सामान्यतया औलिकर वंश से अभिहित किया जा सकता है, के समय में इस क्षेत्र की समृद्धि में चार चाँद लगे। यशोधर्मन एवं द्रव्यवर्धन भी इस क्षेत्र के अधिपति रहे। कुछ ही समय के लिए सही पर यहाँ वर्धनवंशीय सामान्य हर्ष, कलचुरियों, प्रतिहारों तथा राष्ट्रकूटों की भी शासन का प्रमाण मिलता है। परमार-शासनकाल, विशेषकर गुर्जर के समय में तो इसका सभी क्षेत्रों में विकास हुआ। यद्यपि सामान्य भोज ने धार को अपनी राजधानी तो अवश्य बना ली किन्तु वे भी उज्जैन की उपेक्षा नहीं कर सके। चालुक्य सामान्य सोमेश्वर प्रथम तथा अनहिल पाटन-शासक जयसिंह सिद्धराज के आक्रमण से इस क्षेत्र की प्रतिष्ठा पर आघात अवश्य लगा, फिर राजपूत राजवंश शक्तिहीन हुआ, राजनीतिक शक्ति में ह्रास आया अनेक धार्मिक-आध्यात्मिक प्रतिमानों का विखण्डन हुआ और पारम्परिक धार्मिक आस्था को ग्रहण लगा। इस तथ्य के स्पष्ट प्रमाण हैं कि महमूद गजनी के आक्रमण के समय यहाँ के शासक ने प्रतिरोधी दल के सहभागी के रूप में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। यह बात अलग है कि कालान्तर में इल्तुतमिश के आक्रमण का सफल प्रतिरोध कर पाना सम्भव नहीं रहा और इस कारण इस क्षेत्र की राजनीतिक और सांस्कृतिक गरिमा को बहुत आघात लगा।
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