राम-कथा-त्रयी : वाल्मीकि, भास तथा कालिदास : Ram-Katha-Trayi
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| Author | Shitanshu Rath |
|---|---|
| Edition | 1996 |
| Language | Sanskrit, Hindi |
| Pages | 270 |
| Cover | Hardbound |
| ISBN | 978-81-85268-76-2 |
| Publusher | Pratibha Prakashan |
Categories: Sanskrit, Modern Sanskrit Literature
Tags: Classics, Indian Philosophy, Indology, Ramayana, Sanskrit
About the Book
कवीन्द्रं नौमि वाल्मीकिं यस्य रामायणीं कथाम्।
चन्द्रिकामिव चिन्वन्ति चकोरा इव साधवः॥
रामायण की कथा अब सारे विश्व की साहित्यिक चेतना में अंकित हो चुकी है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी एशियाई भू-भागों में इस कथा के प्रसार तथा स्वतंत्र विकास का इतिहास भी लगभग पन्द्रह सौ वर्ष पुराना है। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के हमारे आधुनिक युग में रामायण की कथा ने सुदूर अमेरिका और यूरोप के क्षितिज को भी आलोकित किया है। रामायण की कथा अपने मूल रूप में संस्कृत साहित्य की धरोहर है और महर्षि वाल्मीकि से इसका अभेद सम्बन्ध है। भारत से बाहर कुछ एशियाई अंचलों में यह रामकथा उनकी अपनी जातीय अस्मिता की अभिव्यक्ति बन कर भी उभरी है जब कि ये अंचल इस के मूल संस्कृत रूप के साथ वाल्मीकि से भी अपना परिचय प्रमाणित करते हैं। देश और काल की परिधि के अन्तर्गत निरन्तर परिवर्तनशील भाषाई परिवेश में रामायण कथा के अनगिनत संस्करण और उनका इतिहास भी सहस्राब्दी की देहरी लांघ चुके हैं। यहाँ प्रश्न केवल अपभ्रंश और प्राकृत भाषाओं का नहीं है। रामकथा भारत की समस्त प्रादेशिक भाषाओं से लेकर अद्यतन आंचलिक लोक-भाषाई चेतना में भी गहरी आस्था के साथ अपनी जीवन्त प्रामाणिकता प्रतिपादित कर रही है। भारत के वनवासी समुदाय से लेकर आभिजात्य और बुद्धिजीवी वर्ग तक कोटि-कोटि भारतीय राम नाम को मुक्ति का साधन मानते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने ‘हे राम’ कह कर ही अन्तिम साँस ली थी। वस्तुतः रामायण की कथा में भारत की आत्मा का साक्षात्कार होता है।
भारतीय साहित्य की परम्परा में रामायण को आदि-काव्य और वाल्मीकि को आदिकवि कहा गया है। इस ग्रन्थ में वाल्मीकि, भास तथा कालिदास की दृष्टि से रामकथा के स्वरूप और विकास का अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।
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