भगवद्गीता एवं भागवतपुराण में कर्म की अवधारणा : Bhagavad Gita evam Bhagwat Puran mein Karma ki Avdharna
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| Author | Sudha Trivedi |
|---|---|
| Edition | 2013 |
| Language | Hindi |
| Pages | 160 |
| Cover | Hardbound |
| ISBN | |
| Publusher | Pratibha Prakashan |
Category: Indian Philosophy
Tags: Gita, Hinduism, Indian Philosophy, Krishna, Purana, Sanskrit
पुस्तक परिचय
श्रीमद्भगवद्गता-भारतीय साहित्य, धर्म एवं दर्शन में अपना एक विशिष्ट स्थान रखती है, साथ ही गीता में सामाजिक, व्यवहारिक एवं नैतिक धर्म का भी समावेश है। भारतीय मनोषियों ने अपने-अपने मतों का प्रतिपादन गीता को आधार मानकर किया, परन्तु गीता की यह विशेषता है कि वे सभी अपने मतों के सम्पादन में सफल रहे, भले ही उनके सिद्धान्तों में परस्पर मतभेद रहा हो।
मानव का परम लक्ष्य दुःख-निवृत्ति एवं परम सत्य को प्राप्त करना है। गीता का प्रारम्भ युद्ध क्षेत्र में हुआ, जहाँ अर्जुन पर धर्म संकट आ जाने के कारण उसे किसी ऐसे मार्ग की आवश्यकता थी जो निष्पाप हो। भगवद्गीता एक ऐसा ग्रन्थ है, जो जगन्मिथ्यात्मवाद को कर्मयोग का आधार नहीं मानती एवं पारलौकिक तत्त्वों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित न करके, व्यक्ति पर भी अपना ध्यान केन्द्रित करती है। व्यक्ति की समस्या से ही गीता का प्रारम्भ होता है, एवं समस्या के समाधान से ही इसका अन्त होता है।
दूसरी ओर, भागवत में भी हमें ज्ञान, भक्ति और कर्म का सुन्दर समन्वय देखने को मिलता है। इसमें सकाम कर्म, निष्काम कर्म, साधन ज्ञान, सिद्ध ज्ञान, साधन भक्ति, साध्यभक्ति नवधाभक्ति, प्रेमाभक्ति, द्वैत, अद्वैत और द्वैताद्वैत आदि सभी का परम रहस्य मधुरता से भरा हुआ है। भागवत के अनुसार भक्ति, ज्ञान एवं वैराग्य ये तीनों मार्ग कर्म से आविष्ट होने पर ही फलीभूत होते हैं।
इस ग्रन्थ में गीता एवं भागवत में प्राप्त कर्म सम्बन्धी सम्प्रत्ययों की विवेचना करने का प्रयास किया गया है, जिसके अन्तर्गत कर्मकाण्ड, कर्मविभाग, कर्म-सिद्धान्त, कर्म-मार्ग तथा निष्काम कर्म की विस्तृत व्याख्या के साथ दोनों ग्रन्थों में प्राप्त कर्मसंबंधी व्याख्या का तुलनात्मक विवेचन एवं मूल्यांकन प्रस्तुत किया गया है।
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