अथर्वाङ्गिरस परम्परा में सांस्कृतिक मूल्य : Atharvangiras Parampara mein Sanskritik Mulya
₹395.00 Original price was: ₹395.00.₹325.00Current price is: ₹325.00.

| Author | Moti Lal Purohit |
|---|---|
| Edition | 2004 |
| Language | Hindi |
| Pages | 160 |
| Cover | Hardbound |
| ISBN | 978-81-85268-70-3 |
| Publusher | Pratibha Prakashan |
Categories: Vedas, Vedic Literature
Tags: Indian History, Reference Work, Sanskrit, Veda, Vedic Studies
पुस्तक परिचय
भारतीय सभ्यता के विकास में सामाजिक संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वर्ण-व्यवस्था से सम्बद्ध प्रथम उल्लेख ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में दृष्टिगोचर होते हैं। अन्य सामाजिक विवरण भी उसमें उपलब्ध हैं। अथर्ववेद में इन विषयों पर अधिक सामग्री मिलती है। जाति, वर्ण और आश्रम का अधिक विवरण देते हुए अथर्वांगिरस परम्परा में राजतंत्राधारित समाज-व्यवस्था पर अधिक बल दिया गया है। भृग्वंगिरा अथवा अथर्वांगिरा की महत्ता बहुविध है। वृहस्पति जिनको अपने पूर्ववर्ती अर्थशास्त्री के रूप में कौटिल्य उल्लेख करते हैं, वे भी इस परम्परा के हैं।
विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में भी अथर्वांगिरस-परम्परा का अत्यंत उल्लेखनीय स्थान है। एक धातु से दूसरी धातु के मिश्रण और उसके प्रयोग का श्रेय भी इन्हीं को है। अथर्ववेद के वैज्ञानिक संदर्भ इसका संकेत देते ही हैं। वास्तव में भारतीय सभ्यता की अत्यधिक उल्लेखनीय उपलब्धियाँ अथर्वांगिरस परम्परा द्वारा ही प्राप्त हुई हैं।
प्रकृत ग्रन्थ में अथर्वांगिरस-परम्परा के समस्त पक्षों का यथायथ विवेचन प्रस्तुत किया गया है जो एतद्विषयक पाठकों, जिज्ञासुओं एवं गवेषकों के लिए अत्यन्त उपादेय है।
Only logged in customers who have purchased this product may leave a review.
Related products
Culture
Reference Work
Ancient Indian History
Ancient Indian History
Aesthetics














Reviews
There are no reviews yet.